करुणासिक्त साधुमन:
स्वामी विवेकानंद जी को अमेरिका में व्याख्यान हेतु आमन्त्रण मिला। स्वामी जी जाने से पहले गुरु माँ शारदा
(स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी की पत्नी) से आशीर्वाद लेने पहुंचे।
गुरु माँ रसोईघर में थीं। स्वामीजी ने कहा,”माँ मैं आशीर्वाद लेने आया हूँ।” गुरु माँ ने कहा,”ठीक है, पहले तुम मुझे वह चाकू उठाकर दे दो, मुझे सब्जी काटनी है।” विवेकानन्द जी ने चाकू उठाया और विनम्रता पूर्वक मां शारदा की ओर बढ़ाया।
चाकू लेते ही मां शारदा ने आशीर्वचनों की झड़ी लगा दी। वे बोलीं, “तुम अपने उद्देश्य में अवश्य ही सफलता प्राप्त करोगे। अब तुम्हारी सफलता में मुझे कोई संदेह नहीं रहा है।”
स्वामीजी हतप्रभ रह गये। वह समझ नही पा रहे थे कि मेरे चाकू उठाने से ऐसा क्या घटित हो गया। उन्होंने गुरु मां से पूछ ही लिया, ‘आपने आशीर्वाद देने से पहले मुझसे चाकू क्यों उठवाया था ?’ मां शारदा ने कहा, “तुम्हारा मन देखने के लिए। तुमने जब चाकू दिया, तब उसकी धार वाला हिस्सा तुमने अपने हाथ में पकड़ रखा था और हत्थे वाला हिस्सा मेरी तरफ बढ़ाया। यही तो साधु का मन होता है, जो सारी आपदा स्वयं झेलकर भी दूसरे को सुख ही प्रदान करना चाहता है। वह भूल से भी किसी को कष्ट नही देना चाहता। अगर तुम साधुमन नहीं होते तो तुम्हारी हथेली में भी चाकू का हत्था होता, धार वाला सिरा नहीं। जिस व्यक्ति के भीतर इस प्रकार की करुणा होगी, उसके सद्- कार्यों की सफलता को कोई रोक नहीं सकता।”
जय श्रीराम
Sadhu dusro ko sukh देते है और दुर्जन दुख