सुख की खोज
जीवन में आत्मसंतुष्टि एवं विवेक के अभाव में एक धनवान व्यक्ति भी उतना ही दुःखी हो सकता है, जितना एक निर्धन व्यक्ति और आंतरिक समझ की बदौलत एक निर्धन व्यक्ति भी उतना सुखी हो सकता है जितना धनवान।
सुख और दुःख का मापक हमारी आंतरिक प्रसन्नता ही है, ना कि हमारी भोग – विलासिता। वाह्य सुख साधनों से किसी की सफलता का मूल्यांकन करना बुद्धिमत्ता नहीं है। यहाँ पर अक्सर संग्रह करने वालों को रोते और बांटने वालों को हँसते देखा गया है।
किस व्यक्ति ने अपने जीवनकाल में कितना पाया यह नहीं अपितु कितना तृप्ति का अनुभव किया, यह महत्वपूर्ण है। आज बहुत लोग ऐसे हैं जो धन के कारण नहीं मन के कारण परेशान हैं। सही सोच के अभाव में जीवन बोझ बन जाता है। सत्संग से , भगवदाश्रय से, विवेक से ही व्यक्ति आंतरिक समझ प्राप्त कर पाता है।
जय श्रीराम