इन्सानियत
इन्सानियत का अर्थ केवल मनुष्य होने से नहीं, बल्कि हर जीव के प्रति करुणा, अपनापन और जिम्मेदारी निभाने से है। यह एक ऐसी भावना है जो भाषा, धर्म, जाति या प्रजाति की सीमाओं से परे होती है। कभी-कभी प्रकृति हमें ऐसे दृश्य दिखा देती है, जो मनुष्य को उसके ही आदर्शों का आईना दिखा देते हैं।
यह घटना जापान की है। एक व्यक्ति अपने पुराने मकान का नवीनीकरण करवा रहा था। मकान की लकड़ी की दीवारें तोड़ी जा रही थीं। जापान में लकड़ी की दीवारें भीतर से खोखली होती हैं। जब मजदूर दीवार तोड़ रहे थे, तभी उसकी नजर दीवार के अंदर जमी एक छिपकली पर पड़ी। उसका एक पैर लकड़ी में ठुकी कील से बुरी तरह फँसा हुआ था। वह छिपकली वर्षों से उसी जगह स्थिर पड़ी थी।
यह दृश्य देखकर उस व्यक्ति का मन दया से भर गया। साथ ही उसके मन में एक सवाल भी उठा—यह छिपकली अब तक जीवित कैसे है? जब उसने गौर से देखा तो पता चला कि वह कील घर बनते समय, लगभग पाँच साल पहले ठोंकी गई थी। पाँच साल तक बिना हिले-डुले, बिना खुले वातावरण के, एक छिपकली का जीवित रहना असंभव-सा प्रतीत होता था।
जिज्ञासा के कारण उसने काम रुकवा दिया और कुछ देर प्रतीक्षा करने लगा। तभी अचानक दीवार के भीतर से एक दूसरी छिपकली आई। उसके मुँह में भोजन था। वह सीधे उस फँसी हुई छिपकली के पास पहुँची और उसे खाने को देने लगी। यह दृश्य देखकर वह व्यक्ति स्तब्ध रह गया। उसकी आँखें नम हो गईं।
पाँच वर्षों से वह दूसरी छिपकली अपने साथी को भोजन पहुँचा रही थी। उसने न तो साथ छोड़ा, न ही उम्मीद। संकट के समय उसने पीठ नहीं फेरी। एक छोटा-सा जीव, बिना किसी बुद्धि के अहंकार के, सच्ची निष्ठा और प्रेम निभा रहा था।
यह घटना हमें गहराई से सोचने पर मजबूर करती है। हम मनुष्य, जिन्हें बुद्धि और विवेक का वरदान मिला है, अक्सर स्वार्थ में रिश्ते तोड़ देते हैं। तकलीफ़ के समय अपनों से मुँह मोड़ लेते हैं। जबकि सच्ची इन्सानियत यही है कि हम दुख में साथ दें, आशा न छोड़ें और हाथ थामे रखें।
धर्म कोई भी हो, पहचान कोई भी हो—अच्छा इंसान बनना ही सबसे बड़ा धर्म है। क्योंकि प्रभु हमारे शब्द नहीं, हमारे कर्म देखते हैं।
जय श्रीराम
परोपकार सम धर्म नहीं भाई