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जिनके भगवान भी ॠणी हैं

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जिनके भगवान भी ॠणी हैं

एक भक्त थे। उन्होंने भगवान का नाम जपते हुए जीवन बिता दिया पर भगवान से कभी कुछ नहीं माँगा। एक दिन वे भक्त बिहारी जी के मंदिर गए। पर यह क्या वहाँ उन्हें भगवान नहीं दिखे। वे आसपास के अन्य भक्तों से पूछने लगे कि आज भगवान कहाँ चले गए?

सब उनकी ओर हैरानी से देखते हुए कहने लगे भगवान तो ये रहे। आपके सामने ही तो हैं। आपको नहीं दिखते?  अंधे हो क्या?

उस भक्त ने सोचा कि सब को दिख रहे हैं, मुझे क्यों नहीं दिख रहे? मुझे ये सब दिख रहे हैं भगवान क्यों नहीं दिख रहे?….ऐसा विचार कर उनका अंतः करण ग्लानि से भर गया। वे सोचने लगे लगता है कि मेरे सिर पर पाप बहुत चढ़ गया है इसीलिए मुझे भगवान नहीं दिखाई देते। मैं इस शरीर का अन्त कर दूंगा। आखिर ऐसे शरीर का क्या लाभ ? जिससे भगवान ही न दिखते हों।

ऐसा सोच कर वे यमुना में डूबने चले। इधर अंतर्यामी भगवान एक ब्राह्मण का वेष बना कर एक कोढ़ी के पास पहुँचे और कहा कि  ऐसे एक भक्त यमुना को जा रहे हैं उनके आशीर्वाद में बहुत बल है। यदि वे तुझे आशीर्वाद दे दें तो तेरा कोढ़ तुरंत ठीक हो जाएगा। यह सुन कर कोढ़ी यमुना की ओर दौड़ा। उन भक्त को पहचान कर उनका रास्ता रोक लिया और उनके पैर पकड़कर, उनसे आशीर्वाद माँगने लगा।

भक्त कहने लगे भाई! मैं तो पापी हूँ, मेरे आशीर्वाद से क्या होगा पर जब बार बार समझाने पर भी कोढ़ी ने पैर नहीं छोड़े, तो उस भक्त ने अनमने भाव से ही कह दिया भगवान तेरी इच्छा पूरी करें। ऐसा कहते ही कोढ़ी बिल्कुल ठीक हो गया वो भक्त हैरान हो गए कि यह चमत्कार कैसे हो गया? वे अभी वहीं स्तब्ध ही खड़े थे कि साक्षात भगवान सामने आ खड़े हुए।

उस भक्त ने भगवान को देखा तो अपने को संभाल न सके और रोते हुए भगवान के चरणों में गिर गए। भगवान ने उठाया। वे भगवान से पूछने लगे भगवान! यह आपकी कैसी लीला है? पहले तो आप मंदिर में भी दिखाई न दिए और अब अनायास आपका दर्शन ही प्राप्त हो रहा है।

भगवान ने कहा भक्तराज! आपने जीवन भर जप किया पर कभी कुछ माँगा नहीं। आपका मुझ पर बहुत ॠण चढ़ गया था मैं आपका ॠणी हो गया था इसीलिए पहले मुझे आपके सामने आने में संकोच हो रहा था। आज आपने उस कोढ़ी को आशीर्वाद देकर अपने पुण्य पुञ्ज में से कुछ माँग लिया जिससे अब मैं कुछ ॠण मुक्त हो सका हूँ। इसीलिए मैं आपके सामने आने की हिम्मत नहीं कर पाया।

 वे भक्त धन्य हैं जो भगवान का नाम तो जपते हैं, पर बदले में भगवान से कभी कुछ नहीं माँगते। जिनके भगवान भी ॠणी हैं…

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जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

1 Comment

  • निस्वार्थ भक्ति ही सच्ची भक्ति है बाकी तो व्यापार है

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