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नाम में क्या रखा है

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नाम में क्या रखा है

एक बार स्वामी विवेकानंद प्रवचन दे रहे थे। उनका विषय था – भगवान की नाम की महिमा।” श्रोतागण भाव – विभोर होकर सुन रहे थे। तभी एक व्यक्ति खड़ा हुआ और बोला – ” स्वामी जी ! शब्दों में क्या रखा है ? उन्हें कहने से क्या लाभ ? ” वह व्यक्ति अपने को तार्किक समझता था।

स्वामी विवेकानंद ने उसे प्रेम से समझाने की कोशिश की , लेकिन वह व्यक्ति कुतर्क करता रहा। तब अंत में स्वामी जी ने उस व्यक्ति के प्रति अपशब्दों का प्रयोग करते हुए कहा – ” तुम मूर्ख हो, तुम्हें कोई समझ नहीं है। तुम्हारे जैसे बेवकूफ एवं नालायक ही इस तरह की बातें किया करते हैं। “
भरी सभा में अपने प्रति यह संबोधन सुनकर वह तार्किक आगबबूला हो गया और स्वामी जी से कहा – ” आप जैसे महान संन्यासी के मुख में ऐसे वचन शोभा नहीं देते। आपके शब्दों से मुझे बहुत चोट लगी है। “

उस व्यक्ति के कथन को सुनकर स्वामी जी हंसने लगे। सभी लोग आश्चर्यचकित हो गए कि स्वामी जी को क्या हो गया है ! तब स्वामी जी ने हंसते हुए उस व्यक्ति से कहा – बंधु ! मैंने जो कहा , वे तो शब्दमात्र थे। शब्दों में क्या रखा है ? मैंने कोई पत्थर तो तुम्हें नहीं मारे थे , जो तुम इतने क्रोधित हो गए ?

उस तार्किक व्यक्ति का क्रोध शांत हो गया और स्वामी जी से क्षमा याचना करने लगा कि प्रवचन देते समय स्वामी जी को उसके द्वारा टोकना उचित नहीं था। तार्किक व्यक्ति के साथ-साथ उस सभा में उपस्थित सभी श्रोताओं को भी यह समझ में आ गया कि जब अपशब्द क्रोध का कारण बन सकता है , तो प्रिय शब्द आशीर्वाद क्यों नहीं दिलवा सकता ? प्रिय शब्द अंतःकरण में भक्ति के भाव क्यों नहीं जगा सकता ?

इस प्रकार हम देखते हैं कि ” शब्द ” में शक्ति होती है। शब्द एक ओर जहां अंतःकरण में स्थित विकारों को बाहर निकाल सकता है , वहीं दूसरी ओर हृदय में निहित भक्ति भाव को प्रस्फुटित भी कर सकता है।
यह यह अपने पर निर्भर करता है कि हम किस प्रकार के शब्दों के नाम का स्मरण करते हैं – विकारों को उत्पन्न करने वाला या भक्ति-भाव को सुदृढ़ करने वाला।

जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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