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मिट्टी का दिया

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मिट्टी का दीया

काशी के पास गंगा किनारे एक छोटा-सा आश्रम था। वहाँ रहते थे गुरु वेदांतानंद। उनके पास शिष्यों की भीड़ नहीं थी, सिर्फ़ एक शिष्य था – गिरधारी लाल। गिरधारी लाल बहुत बुद्धिमान था, वेद-उपनिषद कंठस्थ कर लेता था, तर्क में किसी को हरा देता था, पर मन हमेशा अशांत रहता था। उसे लगता था कि अभी उसे कुछ और चाहिए, कुछ और बड़ा ज्ञान चाहिए।
एक शाम गुरु ने उसे बुलाया और एक मिट्टी का साधारण-सा दीया थमा दिया। “इसे लेकर गंगा घाट पर जाओ। वहाँ एक बूढ़ा मछुआरा रहता है। उससे कहना कि गुरु ने यह दीया भिजवाया है और इसके बदले जो वह दे, ले आना।” गिरधारी लाल को लगा, यह कोई परीक्षा है। उसने सोचा, शायद मछुआरे के पास कोई दुर्लभ मंत्र या गुप्त विद्या होगी। वह दीया लेकर चल पड़ा। घाट पर एक बूढ़ा मछुआरा जाल सुधार रहा था। गिरधारी लाल ने दीया उसके सामने रखा और कहा, “गुरुदेव ने आपको प्रणाम भेजा है और यह दीया दिया है। इसके बदले जो आप देंगे, मैं ले जाऊँगा।” बूढ़े ने दीया उठाया, उसे उलट-पलट कर देखा, फिर हँसते हुए कहा, “लेकिन भैया, यह तो खाली दीया है। इसमें न तेल है, न बत्ती। मैं इसके बदले क्या दूँ?” गिरधारी लाल ने गंभीर होकर कहा, “महाराज ने कहा था – जो आप देंगे वही ले आना।” बूढ़ा चुप रहा। फिर उसने अपनी झोंपड़ी से एक मिट्टी का छोटा घड़ा निकाला, उसमें तेल भरा और दीये में डाल दिया। फिर एक रुई की बत्ती बनाकर उसमें लगाई और किनारे पड़ी एक जलती हुई मशाल से उसे जला दिया। दीया जल उठा।उसने दीया गिरधारी लाल को लौटाते हुए कहा, ले जाओ। अब यह पूरा हो गया।”
गिरधारी लाल हैरान था। वह दीया लेकर लौटा। गुरु दूर से ही मुस्कुरा रहे थे। गिरधारी लाल ने दीया उनके चरणों में रखा और पूछा, “गुरुदेव, आपने मुझे खाली दीया क्यों भेजा?* और उस बूढ़े ने इसमें तेल और बत्ती क्यों डाली?” गुरु ने दीये की लौ की ओर देखते हुए धीरे से कहा,
“गिरधारी लाल, तुम मेरे पास दस वर्ष से हो। तुम्हारे पास सारा शास्त्र है, सारी विद्या है, सारे तर्क हैं – तुम एकदम सही मिट्टी का दीया हो। लेकिन अभी तक तुम खाली हो।
ज्ञान तभी प्रकाश बनता है जब उसमें श्रद्धा का तेल और समर्पण की बत्ती डाली जाए। जिस दिन तुम्हारी विद्या में गुरु के प्रति श्रद्धा और सेवा का भाव जलेगा तभी तुम पूर्ण हो पाओगे…

समय बीता। गिरधारी लाल अब आश्रम का हर छोटा-बड़ा काम चुपचाप करने लगा। सुबह सबसे पहले उठकर गंगा से जल लाता, गुरु के चरण धोता, चूल्हा जलाता, फूल तोड़ता। बोलता बहुत कम था, पर उसकी आँखों में अब पहले जैसी बेचैनी नहीं थी। एक दिन गुरु वेदांतानंद बहुत अस्वस्थ हो गए। बुखार था, शरीर जल रहा था। रात भर गिरधारी लाल उनके सिरहाने बैठा रहा, गीले कपड़े से पोंछता रहा। सुबह जब गुरु को होश आया, तो उन्होंने गिरधारी लाल का हाथ पकड़ा और धीरे से कहा, “गिरधारी लाल… अब मेरे जाने का समय आ गया है।” गिरधारी लाल का गला रुँध गया, पर वह बोला नहीं। गुरु ने फिर कहा, “तुमने दस साल शास्त्र पढ़े, दस महीने सेवा की। अब बता, सच्चा ज्ञान कौन-सा है?” गिरधारी लाल ने गुरु के चरणों में सिर रख दिया और फफक कर रो पड़ा।
“गुरुदेव… शास्त्रों में जो लिखा था, वह सब सत्य था। लेकिन वह सत्य मेरे भीतर तब उतरा, जब मैंने आपके चरण धोए। ज्ञान वह नहीं जो मुँह से बोला जाए, ज्ञान वह है जो हाथ से किया जाए।” गुरु मुस्कुराए। उन्होंने अपनी अंतिम साँस से पहले कहा, “यही बात उस दिन मछुआरे ने तुझे सिखाई थी। दीया कोई भी हो सकता है… मिट्टी का, सोने का, चाँदी का… लेकिन जब तक उसमें समर्पण की बत्ती और प्रेम का तेल न डाला जाए, वह अंधेरे में ही रहता है।
तुम अब पूरे हो गए हो। अब तुम्हें किसी गुरु की ज़रूरत नहीं। तुम स्वयं गुरु बन चुके हो।” उसी रात गुरु वेदांतानंद ने शरीर त्याग दिया। अगली सुबह गंगा घाट पर वही बूढ़ा मछुआरा जाल डाल रहा था। गिरधारी लाल उसके पास गया। उसके हाथ में वही पुराना मिट्टी का दीया था, जो अब फट चुका था।
गिरधारी लाल ने उसे मछुआरे के सामने रख दिया और बोला, “बाबा, यह दीया अब पूरा हो चुका है। आज इसमें न तेल बचा, न बत्ती। पर इसने अपना काम कर दिया। अब यह आपका है।” मछुआरे ने दीया उठाया, उसे गंगा जल से धोया और फिर अपने छोटे से मंदिर में रख दिया।
बोला, “बेटा, यह दीया कभी मेरा नहीं था, न तुम्हारा, न तुम्हारे गुरु का। यह तो उस परम प्रकाश का था, जो हर खाली दीये में उतरने को बेकरार रहता है।” उस दिन से गिरधारी लाल आश्रम लौटा। उसने गुरु की गद्दी तो नहीं ली, बल्कि आश्रम को सबके लिए खोल दिया।
हर शाम वह गंगा किनारे बैठता और आने वाले हर यात्री को एक खाली मिट्टी का दीया थमा देता।
और जब कोई पूछता, “इसमें क्या डालें?”
तो वह मुस्कुराकर कहता, “श्रद्धा का तेल और समर्पण की बत्ती।
फिर देखना… यह छोटा-सा दीया भी सूरज बन जाएगा।”और सचमुच, काशी के उस छोटे से आश्रम में अब सैकड़ों दीये जलने लगे।
हर दीया अलग था, पर लौ एक ही थी। कहानी यहीं पूरी नहीं होती…वह लौ आज भी जल रही है,

जब भी कोई शिष्य अपने गुरु के चरण धोता है,जब भी कोई गुरु अपने शिष्य को अपना सर्वस्व दे देता है।

जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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