हृदय और हाथ
बागेश्वर धाम मंदिर का परिसर भक्तों से धीरे–धीरे भरने लगा था। सुबह की पहली किरण जब मंदिर के सुनहरे कलश को छूकर लौटी, तो ऐसा लगा मानो आज का दिवस किसी विशेष महोत्सव की आभा लिए हुए है। कारण भी विशेष था—संयम साधना स्वर्ण महोत्सव।
हर ओर रंग-बिरंगी पताकाएँ, पूजा की मधुर सुगंध, घंटियों की गूँज और श्रद्धालुओं के चेहरों पर भक्ति का तेज दिखाई दे रहा था। उसी परिसर में एक बड़ी सभा का आयोजन था, जहाँ आचार्य नंदा अपने “जीवंत चिंतन” के माध्यम से लोगों का मार्गदर्शन करने वाले थे।
सभा आरंभ हुई। आचार्य नंदा ने मंच पर आते ही मुस्कराकर सबको आशीर्वाद दिया। फिर उन्होंने धीरे-धीरे बोलते हुए एक अद्भुत सूत्र समझाया— “हाथ से नहीं, हृदय से दान करो।”
सभा में बैठे लोग शांति से उनकी वाणी को सुनने लगे।
आचार्य नंदा बोले, “हमारे पास जीवन में दो चीजें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं—एक हृदय, दूसरा हाथ। दोनों का अपना-अपना महत्व है। लेकिन सच्ची सार्थकता तब जन्म लेती है, जब हृदय और हाथ दोनों एक साथ, एक दिशा में काम करने लगते हैं।”
उन्होंने आगे कहा, “पहली बात—हृदय। हृदय से किया गया कार्य अपने आप में पवित्र और सफल बन जाता है। जब मन में दया, प्रेम और सेवा की भावना होती है, तब दान का मूल्य वस्तु में नहीं, बल्कि भावना में निहित होता है। किसी को प्रेमपूर्वक दिया गया एक छोटा सा अन्न का कण भी उस दान से बड़ा है जो दिखावे के लिए किया गया हो।”
सभा में बैठे लोग सहमति में सिर हिलाने लगे।
फिर आचार्य नंदा ने कहा, “दूसरा है हाथ। हमारा हाथ हमेशा ऊपर रहना चाहिए—अर्थात देने वाले के रूप में। देने की आदत इंसान को महान बनाती है। लेने का स्वभाव व्यक्ति को छोटा करता है, जबकि देने का स्वभाव उसे ऊँचा उठाता है।”
इसके बाद उन्होंने एक घटना सुनाई—“एक गरीब बुजुर्ग महिला मंदिर आई। उसके पास देने लायक कुछ नहीं था। उसने केवल एक छोटी-सी रोटी हृदय से बनाकर प्रसाद में अर्पित की। बहुतों ने उसकी साधारण रोटी देखकर उपेक्षा की, परंतु भगवान ने उसके हृदय का भाव स्वीकार किया। उसके जीवन में चमत्कारिक परिवर्तन आए। यह साबित करता है कि भाव का दान वस्तु के दान से बड़ा होता है।”
लोग मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे।सभा में एक युवक, अर्पित, आचार्य नंदा की वाणी से भीतर तक प्रभावित हो गया। वह कई दिनों से बेचैन था कि जीवन में सबकुछ होने के बावजूद उसे संतोष क्यों नहीं मिलता। आचार्य नंदा के शब्द उसकी आत्मा पर दस्तक दे रहे थे।
सभा के बाद उसने मंदिर के बाहर बैठे कुछ गरीब बच्चों को देखा—कुछ नंगे पाँव, कुछ भूखे। पहले वह केवल सिक्के दे देता था, पर आज उसने कुछ और महसूस किया। वह दुकान से भोजन लाया, बच्चों को अपने हाथों से खिलाया, और यह उसने पूरे हृदय से किया।
उस पल उसे वर्षों बाद सच्चा सुकून मिला।
उसे समझ आया—“जब आप किसी की मदद हृदय से करते हैं, तभी जीवन में आनंद उतरता है।” धीरे-धीरे यह उसकी आदत बन गई—हृदय से सोचना और हाथ से देना। और यही था आचार्य नंदा के जीवंत चिंतन का सार—
हृदय और हाथ दोनों को जोड़कर चलो; जीवन स्वयं सार्थक हो जाएगा।
जय श्रीराम