शब्दों का घाव
एक बार एक लकड़हारा एक जंगल में लकड़ी काटने गया। लकड़हारे ने जैसे ही पेड़ काटना शुरू किया उसे एक गुर्राने की आवाज़ सुनाई पड़ी।
उसने देखा की एक शेर पेड़ के नीचे बैठा है। बेचारा लकड़हारा तो डर गया और भागने लगा।
शेर ने लकड़हारे से कहा कि तू डर मत, मेरे पैर में कांटा लगा है, मैं चल नहीं सकता, शिकार भी नहीं किया है, बड़ा भूखा हूँ। तू मेरे पैर का कांटा निकाल दे।
लकड़हारे ने कहा कि तू तो मुझे खा जायेगा।शेर ने कहा कि मैं तुझे नहीं खाऊंगा, कांटा निकाल दे… नहीं तो मैं तुझे खा जाऊंगा। लकड़हारे ने कांटा निकाल दिया और अपने घर चला गया।
घर पहुंच कर उसने यह किस्सा अपनी पत्नी को सुनाया और ज़िंदा लौटने कि ख़ुशी में एक पार्टी भी आयोजित की। शेर को भी आमंत्रित किया।
अब उसके गेस्ट शेर को देख कर डर रहे थे। लकड़हारे ने लोगों से कहा कि शेर से डरने कि ज़रुरत नहीं है, यह शेर तो कुत्ते से भी सीधा है।
शेर ने लकड़हारे से कुल्हाड़ी लाने के लिए कहा, और फिर शेर ने लकड़हारे से कहा कि वह शेर की कमर पर पूरी ताकत से प्रहार करे।
लकड़हारे ने शेर से कहा कि अगर उसने शेर को मारा तो शेर उसे खा जाएगा।
शेर ने कहा कि अगर लकड़हारा ऐसा नहीं करेगा तो वह उसे खा जायेगा।
खैर, लकड़हारे ने ऐसा ही किया। शेर जंगल वापिस चला गया।
कुछ सालों के बाद जंगल में लकड़हारे की शेर से फिर मुलाकात हुई।
शेर ने लकड़हारे को पार्टी की घटना याद दिलाई।
शेर ने कहा कि देख, वह जो कुल्हाड़ी का घाव था कब का भर चुका है, पर तेरी उस बात का घाव, जो तूने मेरी कुत्ते से तुलना की थी, अभी तक नहीं भरा है ।
शब्द बहुत महत्वपूर्ण होते हैं, बोलने से पहले सोच कर शब्दों का चयन करना चाहिए।
जय श्री राम