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बेटी की अमानत

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बेटी की अमानत

पिछले कई महीनों से, मैं हर महीने अपने पिता को 20,000 रुपये भेज रही हूँ। यह सोचकर कि वे बूढ़े और कमज़ोर हो गए हैं, उन्हें दवा की ज़रूरत है, और उनकी देखभाल के लिए एक सौतेली माँ है, मैं ज़्यादा सुरक्षित महसूस करती हूँ। लेकिन अजीब बात है कि जब भी मैं फ़ोन करती हूँ, मेरे पिता की आवाज़ रुँधी हुई होती है, और वे मेरे सवाल को हमेशा टाल देते हैं जब मैं पूछती हूँ कि आप के पास गुजारे लायक पैसे हैं क्या ?

एक दिन, गाँव के एक पड़ोसी ने मुझे फ़ोन किया और अचानक बोल पड़ा, “तुम्हारे पिता अभी भी मज़दूरी करते हैं, ज़मीन जोतते हैं, निर्माण स्थल पर ईंटें ढोते हैं, मैंने उन्हें एक पैसा भी खर्च करते नहीं देखा…”

यह सुनकर मैं निराश हो गई। मैं और मेरे पति तुरंत दिल्ली से रात की बस पकड़कर उत्तर प्रदेश के उस छोटे से गाँव वापस चले गए ताकि पता लगा सकें कि क्या हुआ था।

जैसे ही मैंने लाल मिट्टी वाले आँगन में कदम रखा, मैंने देखा कि मेरे पिता घर के पीछे सब्ज़ियों के बगीचे में झुके हुए हैं, उनका शरीर बिल्कुल कमज़ोर दिख रहा था। यह दृश्य देखकर, मुझे गुस्सा आ गया और मैं सीधे उस पुराने खपरैल वाले घर में उनसे पूछने के लिए दौड़ी।

मैं तुम्हें जो  हर महीने पैसे भेजती हूँ, वो कहाँ हैं? और इस तरह से क्यों परेशानी में हो?”

मेरी सौतेली माँ – मीना का चेहरा पीला पड़ गया था, काँप रही थी, और उसके मुँह खोलने से पहले ही मेरे पिता ने हाथ हिलाया।

“ठीक है, चलो घर के अंदर चलकर बातें करते हैं…”

लेकिन मैंने मना कर दिया। आखिरकार, वह फूट-फूट कर रोने लगीं, ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गईं और लकड़ी के पलंग के नीचे से एक पुराना कपड़े का थैला निकाला, जिसमें पैसे और ज़मीन के कागज़ात थे। उन्होंने काँपते हुए उसे मुझे थमा दिया। मैंने उसे खोला, और यह देखकर दंग रह  गई कि

जैसे ही सौतेली मां मीना ने वह पुराना कपड़े का थैला मेरे हाथों में थमाया, मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गई। हाथ काँप रहे थे, माथे पर पसीना छलक आया। मैंने धीरे-धीरे उस थैले को खोला।

अंदर 500-500 के नोटों की गड्डियाँ करीने से बंधी पड़ी थीं। इतना पैसा देखकर मैं हतप्रभ रह गई। मैं गिन भी नहीं पा रही थी, बस थरथराती उंगलियों से नोटों को उलट-पलट रही थी। थैले के एक कोने में कुछ पुराने, पीले पड़े कागज़ थे। खोलने पर पता चला ये ज़मीन के कागज़ात थे, जो पिता के नाम पर दर्ज थे।

मैं गुस्से से बोली —“ये सब क्या है? आप लोग मुझे धोखा दे रहे थे? मैंने सोचा था पापा बूढ़े हो गए हैं, काम नहीं कर सकते, इसलिए हर महीने बीस हज़ार भेजती रही… और यहाँ तो लाखों रूपये छिपाकर रखे हुए हैं!”

मीना जमीन पर बैठी रो रही थी। पिता वहीं खड़े थे, झुके हुए, और उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

मैंने फिर पूछा —“पापा, आप मज़दूरी क्यों करते रहे? जब पैसे थे तो खुद को क्यों कष्ट दिया? और ये छुपाया क्यों?”

पिता ने भारी आवाज़ में कहा —“बिटिया… गुस्सा मत कर। सच्चाई सुन ले। यह पैसा तेरा भेजा हुआ है मैंने तेरे भेजे पैसों को कभी खर्च नहीं किया। मैंने और मीना ने तेरा भेजा हर रुपया संभाल कर रख दिया। मुझे लगा… अगर एक दिन तेरी शादी-शुदा ज़िंदगी में तुझे किसी मुसीबत का सामना करना पड़े, अगर तेरे बच्चों की पढ़ाई या घर बनाने का वक्त आए… तो तेरे पास एक सहारा हो। यही तो बाप का फ़र्ज़ है।

मैं अवाक रह गई। “लेकिन पापा… आप मज़दूरी क्यों करते रहे? जब शरीर जवाब दे रहा था, तो क्यों खेतों और ईंट-भट्टे पर पसीना बहाते रहे?”

पिता ने कांपते स्वर में कहा —“बिटिया, अगर मैं तेरा भेजा पैसा अपने ऊपर खर्च करता, तो तुझे हमेशा लगेगा कि मैं तेरे पैसों पर जी रहा हूँ। मैं ये बोझ तुझ पर नहीं डालना चाहता था। मैं गरीब सही, पर अपने श्रम से जीना जानता हूँ। तेरे पैसे को मैंने कभी अपनी ज़रूरत समझा ही नहीं। उसे मैंने तेरी अमानत की तरह संभाल कर रखा।”

मेरी आँखों से आँसू बह निकले।

मीना ने बीच में कहा —“बिटिया, मैंने कई बार कहा कि आप बूढ़े हो गए हैं, काम छोड़ दो। मगर तुम्हारे पिता नहीं माने। कहते रहे कि बेटी की कमाई का एक-एक रुपया उसकी दौलत है, हमें बस इसे सुरक्षित रखना है।”

मेरा गुस्सा शर्म में बदल गया। मैं धीरे से पिता के पैरों पर गिर गई।

“पापा, मैं आप पर शक करती रही… आपको गलत समझती रही… और आप तो मेरी ज़िंदगी के सबसे बड़े सहारे बने बैठे थे।”

पिता ने काँपते हाथों से मेरा सिर सहलाया -“बिटिया, जब तू छोटी थी, तेरी माँ की मौत के बाद मैंने तेरे लिए ही तो दूसरी शादी की थी, ताकि तुझे माँ का साया मिले। ज़िंदगी भर सिर्फ तेरे भविष्य के लिए मेहनत करता रहा। बस अब इतना चाहता हूँ कि तू खुश रहे।”

मेरा पति भी चुपचाप खड़ा यह सब देख रहा था। उसकी आँखें भी भर आईं। उसने झुककर पिता का हाथ थाम लिया और बोला बाबूजी, आपने हमें जो दिया है, वो पैसा नहीं… बल्कि एक अनमोल सीख है। आपने दिखा दिया कि सच्ची दौलत त्याग और आत्मसम्मान है।

मैंने थैले को अपने सीने से लगाया और पिता की ओर देखा —

“ये अमानत अब भी मेरी नहीं, आपकी है। लेकिन अब मैं आपको और मज़दूरी नहीं करने दूँगी। ये पैसा आपके इलाज और आराम के लिए इस्तेमाल होगा। पापा, अब मेरी बारी है आपको सहारा देने की।”

उस शाम गाँव के आँगन में बैठकर जब हमने सब मिलकर खाना खाया, तो मुझे लगा —मैंने अपने पिता को नए रूप में जाना है। वे सिर्फ मेरे पिता नहीं, बल्कि त्याग और ईमानदारी की मूर्ति हैं।

और उस पल मैंने मन ही मन ठान लिया —अब चाहे जैसे हालात हों, अपने पिता को कभी अकेला नहीं छोड़ूँगी।

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जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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