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साधु व संतों का तिरस्कार

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साधु व संतों का तिरस्कार

साधु व संतों का जब जब तिरस्कार हुआ, सर्वनाश को रोका नहीं जा सका! कलियुग में भी संतों का सम्मान गिरता जा रहा है। क्या हम फिर से सर्वनाश को आमंत्रण दे रहे हैं? महाभारत काल की एक घटना से समझते हैं:-बात उस समय की है, जब पांडव अठारह दिन चले भीषण युद्ध में विजय प्राप्त कर चुके थे। पांडवों, कृष्ण और अन्य गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में अश्वमेधयज्ञ करने का निर्णय हुआ।

अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा एक देश से दूसरे देश होते हुए आगे बढ़ता जा रहा रहा था। जो देश प्रतिकार करता उसे युद्ध में हराकर पांडवों की सेना आगे बढ़ जाती थी।

अंततः कई महीनों के बाद अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा वापस हस्तिनापुर (वर्तमान में दिल्ली) आ पहुंचा। यज्ञ के समापन के लिए हवन, संघति और पंघति का निर्णय लिया गया। सुदूर देशों तक के सभी राजाओं को यज्ञ में सम्मिलित होने का निमन्त्रण भेजा गया।

श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन में यज्ञकुण्ड के समीप ही एक बड़ा घंटा बांधा गया जिसे यज्ञ के समापन पर सबके भोजन ग्रहण कर लेने के बाद बजना था। एक-एक कर सभी आमंत्रित और उपस्थित लोगों ने भोजन ग्रहण कर लिया फिर भी घंटा नहीं बजा। सबके साथ साथ श्री कृष्ण को भी इस घटना पर बहुत आश्चर्य हुआ।

बहुत टटोलने पर भीम ने कृष्ण को बताया कि सुपक्ष नाम के संत को आमंत्रण नहीं दिया गया है। ऐसा ज्ञात होते ही श्री कृष्ण को बहुत धक्का लगा और वे स्वयं संत सुपक्ष के पास गये और अपने साथ सादर पुर्वक यज्ञ स्थल पर ले आये।

जैसे ही संत सुपक्ष ने भोजन का पहला ग्रास लिया, घंटा बजने लगा। पांडवों द्वारा किसी संत का तिरस्कार देख श्री कृष्ण का भाव पूर्णतः बदल गया और परिणाम स्वरूप श्री कृष्ण का ध्यान पांडवों पर से धीरे धीरे हटने लगा।

वह तो कृष्ण की योगिक शक्ति ही थी जिसने एक एक क्षण पूरे महाभारत युद्ध काल में उनकी कौरव महारथियों से रक्षा की। परन्तु सफलता के आवेग में आकर मानवता को भुला देना पांडवों से श्री कृष्ण की दूरी का कारण बना।

एक दिन वह घड़ी आ ही गयी जब अर्जुन उसी सफलता के आवेश में आकर कोल, भील और संथालों से जाकर भीड़ गया और हार तो हुई ही किसी प्रकार वीरगति को प्राप्त होने से बच गया। वही अर्जुन था, वही गांडीव, वही बाण थे और कृष्ण के साथ के बिना अर्जुन की ऐसी दुर्दशा हुई। तभी यह कहने में सुना जाता है कि…

मानुष बल नहीं होत है, समय होत बलवान।।

भीलन बन लुट लिए, वही अर्जुन वही बाण।।

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जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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