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Year Archives: 2024

Quotes

सुविचार-सुन्दरकाण्ड-179

जय श्री राधे कृष्ण ……. "सुनि प्रभु बचन कहहिं कपि बृंदा, जय जय जय कृपाल सुखकंदा, तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा, कहा चलैं कर करहु बनावा ।। भावार्थ:- प्रभु के वचन सुन वानर गण कहने लगे - कृपालु आनन्दकन्द श्री राम...

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दान का महत्व

दान का महत्व एक बार की बात है कि श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे। रास्ते में अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा कि प्रभु – एक जिज्ञासा है  मेरे मन में, अगर आज्ञा हो तो पूछूँ ?......श्री...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-178

जय श्री राधे कृष्ण ……. "उमा राम सुभाउ जेहिं जाना, ताहि भजनु तजि भाव न आना, यह संबाद जासु उर आवा, रघुपति चरन भगति सोइ पावा ।। भावार्थ:- हे उमा! जिस ने श्री राम जी का स्वभाव जान लिया, उसे...

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ईश्वर का प्रमाण

ईश्वर का प्रमाण एक दिन एक राजा ने अपने सभासदों से कहा, ‘क्या तुम लोगों में कोई ईश्वर के होने का प्रमाण दे सकता है ?......सभासद सोचने लगे... अंत में एक मंत्री ने कहा, ‘महाराज, मैं कल इस प्रश्न का...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-177

जय श्री राधे कृष्ण ……. "नाथ भगति अति सुखदायनी, देहु कृपा करि अनपायनी, सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी, एवमस्तु तब कहेउ भवानी ।। भावार्थ:- हे नाथ! मुझे अत्यंत सुख देने वाली अपनी निश्चल भक्ति कृपा कर के दीजिए ।...

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रिश्तों में सामंजस्य

रिश्तों में सामंजस्य निहारिका की शादी खूब धूमधाम से हुई। वह बहुत खुश है। ससुराल में उसे खूब अच्छा लाड प्यार मिल रहा है। पग फेरे (गौने)की रस्म के लिए आज वह मायके आई हुई है। सुबह से ही चहक...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-176

जय श्री राधे कृष्ण ……. "सो सब तव प्रताप रघुराई, नाथ न कछू मोरि प्रभुताई ।। भावार्थ:- यह सब तो हे रघुनाथ जी, आप ही का प्रताप है । हे नाथ! इसमें मेरी प्रभुता (बड़ाई) कुछ भी नहीं है ।।...

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श्री हनुमानजी और यम

श्री हनुमानजी और यम हनुमान जी की यम से मुठभेड़ तब होती है जब हनुमानजी माता सीता का पता लगाने के लिए लंका जाते हैं।   माता सीता को खोज सफलतापूर्वक पूरी होने के बाद हनुमानजी ने अशोक वाटिका में मेघनाथ...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-175

जय श्री राधे कृष्ण ……. "साखामृग कै बड़ि मनुसाई, साखा तें साखा पर जाई, नाघि सिंधु हाटकपुर जारा, निसिचर गन बधि बिपिन उजारा ।। भावार्थ:- बंदर का बस यही पुरुषार्थ है कि वह एक डाल से दूसरी डाल पर चला...

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सदैव अच्छा करो

सदैव अच्छा करो एक औरत अपने परिवार के सदस्यों के लिए प्रतिदिन भोजन पकाती थी और एक रोटी वह वहाँ से गुजरने वाले किसी भी भूखे के लिए पकाती थी। वह उस रोटी को खिड़की के सहारे रख दिया करती...

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