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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-234

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जय श्री राधे कृष्ण …..

“*निर्मल मन जन सो पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा, भेद लेन पठवा दससीसा, तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा ।।

भावार्थ:– जो मनुष्य निर्मल मन का होता है, वही मुझे पाता है । मुझे कपट और छल – छिद्र नहीं सुहाते । यदि उसे रावण ने भेद लेने को भेजा है, तब भी हे सुग्रीव ! अपने को कुछ भी भय या हानि नहीं है….!!

सुप्रभात

आज का दिन प्रसन्नता से परिपूर्ण हो..

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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